शहाबुद्दीन को सजा दिलाकर तिहाड़ जेल तक पहुंचाने वाले चंदा बाबू का निधन,न्याय की लड़ाई में गवांए तीन बेटों की जान

शहाबुद्दीन को सजा दिलाकर तिहाड़ जेल तक पहुंचाने वाले चंदा बाबू का निधन,न्याय की लड़ाई में गवांए तीन बेटों की जान

इंडिया सिटी लाइव (छपरा)17 दिसम्बर: तेजाब कांड के गवाह चंद्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू का निधन बुधवार की देर शाम उनके आवास पर हो गया। बताया जा रहा है कि बुधवार की देर शाम उनके सीने में दर्द की शिकायत के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें हार्ट अटैक आया है। इलाज के दौरान ही चंदा बाबू ने दम तोड़ दिया। सदर अस्पताल के चिकित्सकों ने बताया कि उनकी मौत हार्ट अटैक से हुई है। मौत की सूचना मिलते ही उनके आवास पर सांत्वना देने वालों का तांता लग गया। अब चंदा बाबू के परिवार में क मात्र उनका एक दिव्यांग बेटा ही बचा है।

बता दें कि चंदा बाबू के दो पुत्रों को तेजाब से नहलाकर हत्या करने का आरोप राजद के पूर्व सांसद मो. शहाबुद्दीन पर लगा था। इस मामले में शहाबुद्दीन को निचली अदालत से सजा भी हुई। यह मामला काफी चर्चित हुआ। इसके बाद उनके तीसरे पुत्र राजीव रोशन जो चंदा बाबू के साथ इस कांड का मुख्य गवाह था उसकी हत्या भी अपराधियों ने शहर के डीएवी मोड़ पर गोली मार कर दी थी। इसके बाद चंदा बाबू की पत्नी का निधन पिछले वर्ष हो गया। पत्नी के निधन के बाद वे अपने दिव्यांग चौथे पुत्र के साथ अकेले शहर के गौशाला रोड स्थित अपने आवास में रहते थे।

अगस्‍त 2004 से पहले चंदा बाबू का था क खुशहाल परिवार

अत्याचार के खिलाफ जंग लड़ रहे एक साधारण,सामान्य बुजुर्ग नागरिक ने देश के सबसे बड़े बाहुबली और आतंक का पर्याय बन चुके शहाबुद्दीन को सलाखों के पीछे पहुंचवा दिया लेकिन आखिरकार चंदा बाबू अपने जीवन की जंग बुधवार की देर शाम हार गए। शहर के गौशाला रोड के एक साधारण व्यवसायी चंद्रकेश्वर प्रसाद और चंदा बाबू के घर खुशहाली का माहौल 2004 के स्वतंत्रता दिवस के पूर्व तक सामान्य था। दो भाई में छोटे भाई चंदा बाबू सीवान में रहकर अपने व्यवसाय संभालते थे जबकि एक भाई पटना में अधिकारी थे। चंदा बाबू का एक भरा पूरा परिवार था। पढ़ी-लिखी पत्नी और 4 बच्चे थे। 3 बच्चे अलग-अलग दुकानों पर व्यवसाय संभाल रहे थे जबकि एक बच्चा दिव्यांग होने की वजह से उन दोनों के साथ रहता था।

आखिरी दम तक लड़ते रहे चंदा बाबू-

2004 में अचानक चंदा बाबू पर दुखं का पहाड़ टूटना शुरू हुआ। चंदा बाबू ने गौशाला रोड के  अपने पुराने आवास को नया रूप देना शुरू किया और उसमें एक छोटी सी कोठरी पर कब्जा कर एक व्यक्ति ने गुमटी रखकर अपना दुकान चलाना आरंभ कर दिया। प्रारंभ में तो वह गुमटी एक दिखावे की थी, लेकिन जैसे ही निर्माण कार्य पूरा होने को था तो उस दुकानदार ने उस दुकान पर अपना कब्जा बनाना चाहा । इसी को लेकर पंचायती आरंभ हुई और 16 अगस्त 2004 को कुछ बाहरी तत्वों के दबाव बनाने पर चंद्रकेश्वर बाबू उर्फ चंदा बाबू के परिवार और बाहरी आगंतुकों के बीच झड़प हो गई। जान बचाने के उद्देश्य से चंदा बाबू के परिवार वालों ने कारोबार के उद्देश्य से रखे गए तेजाब को फेंक कर अपनी जान बचाई जिसमें बाहरी तत्वों के दो लोग गंभीर रूप से जख्मी हो गए । प्रतिरोध के रूप में चंदा बाबू के दो पुत्रों को जबरन उठा लिया गया। मां कलावती देवी ने अपने दो बच्चों के अपहरण को लेकर मुफस्सिल थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई। प्राथमिकी दर्ज होने के पश्चात भी दोनों बच्चे प्राप्त नहीं हुए और अपहरण को लेकर मामला न्यायालय में स्थानांतरित हो गया। चंदा बाबू पर कई प्रकार का दबाव बनाया गया था कि मुकदमे को उठा लिया जाए, लेकिन चंदा बाबू का साहस ही था कि मामला तेजाब कांड के रूप में चर्चित हो गया।

शहाबुद्दीन को आजीवन कारावास

अपहृत दो लड़कों के साथ बड़ा लड़का राजीव रोशन उर्फ राजेश भी उसी समय से लापता था, लेकिन अचानक से वह 2015 में उपस्थित हो आया और न्यायालय में आकर  मोहम्मद शहाबुद्दीन के विरुद्ध उसने गवाही दी और मामला अपहरण से हत्या के रूप में स्थानांतरित हो गया। अंततः तेजाब हत्याकांड की सुनवाई हुई और मोहम्मद शहाबुद्दीन सहित अन्य तीन को आजीवन कारावास की सजा दी गई। मामले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील हुआ तदनुसार उच्चतम न्यायालय तक मामला गया और उच्चतम न्यायालय ने निचली अदालत की सजा को बरकरार रखते हुए मोहम्मद शहाबुद्दीन को तिहाड़ जेल तक पहुंचा दिया।

तेजाब कांड के मुख्य गवाह राजीव रोशन की भी हत्या 2015 में अपराधियों ने कर दी। हत्या का मामला अब भी मामला न्यायालय में लंबित है। चंद्र केश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू का जंग अभी यहीं समाप्त नहीं हुआ था।तेजाब कांड के अन्य आठ अभियुक्तों के लंबित मामले में भी उनकी गवाही हो गई थी।राजीव रोशन के हत्यारों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज थी वह मामला भी ट्रायल के स्तर पर था । इंसाफ की लड़ाई लड़ते-लड़ते चंदा बाबू मानसिक रूप से भी कमजोर हो गए थे और उम्र ने शरीर का साथ देना छोड़ दिया था।

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